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उदारवादी शिक्षा से ही मजबूत होगा लोकतंत्र

Submitted by shashi on Wed, 01/16/2019 - 02:39

सबको समायोजित करने और सामाजिक व सांस्कृतिक विरोधाभास मिटाने वाले मध्यमार्ग का निर्माण

चुनावों की एक और शृंखला आकर चली गई, अब आम चुनाव की आहट है। किसी सर्जरी की तरह चुनाव नेताओं के दिमाग से सारे विचार निकालकर उनका फोकस आर्थिक व शासन संबंधी सुधारों के कठि न काम को भुलाकर लोकलुभावन कदमों व खैरात बांटने पर केंद्रित कर देते हैं। नतीजों ने दिखाया कि भारतीय स्वभाव से शक्की हैं और अपने नेताओं को बदलने में झिझकते नहीं। 2014 की विशाल निश्चितताओं की जगह अब 2019 के महान संदेह ने ले ली है।

प्राचीन काल से ही भारतीय मिज़ाज को अनिश्चितता से कोई दिक्कत नहीं रही है। इस मिज़ाज का उद्गम ऋग्वेद के ख्यात नासदीय सूक्त में ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर दुविधा में है, जिस में 'नेति नेति ' (यह नहीं, वह भी नहीं) की संदेहवादी अद्वैत पद्धति अपनाई गई। प्रशन उठाने का हमारा मिज़ाज नागरिकता और लोकतंत्र निर्मित करने में एक ताकत है। दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा व्यवस्था प्रश्न पूछने की इस प्रवृत्ति को पोषित करने की बजाय रटने की पद्धति के माध्यम से इसे खत्म करती है। टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और 'उपयोगी विषयों' ने जिज्ञासा को प्रोत्साहित करने वाली पुरानी शैली की उदार शिक्षा की जगह ले ली है। कुछ श्रेष्ठ , निजी उदार कला व विज्ञान संस्था न जैसे अशोका, क्रिया और अहमदाबाद यूनिवर्सिटी में ह्युमैनिटीज इनिशिएटिव भविष्य की कुछ उम्मीद जगाते हैं। जब दुनियाभर में 'लिबरल' (उदार) शब्द बदनाम कर दिया गया है, यह याद रखना उचित होगा कि 'लिबरल' की जड़ें 'लि बर्टी ' (स्वतंत्रता) में है। उदार शिक्षा किसी विषय विशेष में महारत की बजाय सीखने की पद्धति है। यह तर्क करनासिखाती है और व्यक्ति को खुद का आकलन करने का आत्मविश्वास देती है। उपनिषद की तरह यह भी प्रश्न पूछने पर निर्भर है। इसमें मूल पाठ को पढ़कर समूह में उस पर प्रश्न पूछना शामिल है। यह किसी छात्र के दिमाग में तथ्य उड़े लने के एकदम विपरीत है।

उदार शिक्षा एक ऐसे मुक्त मानव-मात्र के लिए उचित है, जिस में खुद पर शासन करने और सामूहिक स्व-शासन में भागीदार होने की क्षमता हो। चुनाव के वक्त यह योग्यता किसी धोखेबाज उम्मीदवार और समझदार व गंभीर प्रत्याशी के बीच फर्क करने में मददगार होती है। इस तरह यह नागरिकता निर्माण करने में मददगार है। हाल के चुनाव में यह कृषि ऋण माफी के विनाशक विचार का भंडाफोड़ कर देती, जो डिफाल्टर को पुरस्कृत करती है और ईमानदार किसानो को सजा देती है। राज्यों को दिवालिया करके वास्तविक कृषि सुधार के लिए कोई पैसा नहीं छोड़ती, वह अलग।

जब हम किसी चीज का अध्ययन सिर्फ उस चीज को जानने के लिए करते हैं तो इससे बचपन की हमारी मूल जि ज्ञासा को मजबूती मिलती है और हमारी सभ्यता के प्रचीन संदेहवादी तेवर निर्मित करती है। उदारवादी शिक्षा से हमारे राजनीतिक विमर्श का स्तर बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है, जो हाल के वर्षों में बहुत नीचे गिर गया है। इसके लिए सभी राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं। राहुल गांधी ने रफाल सौदे को लेकर लगातार 'चौकीदार चोर है' कहकर इसमें योगदान दिया। उन्होंने अपने उन पदाधिकारियों की भी निंदा नहीं की, जिन्होंने मोदी की मां की उम्र और पिता को लेकर घिनौने जातिगत आक्षेप लगाए। हालांकि , उन्हें श्रेय है कि एक पूर्व मंत्री द्वारा मोदी की पेशागत जाति का अपमानजनक उल्लेख करने पर उन्होंने उस नेता की ओर से माफी मांगी। पूर्व में सोनिया गांधी द्वारा 'मौत का सौदागर' का उल्लेख उतना ही असभ्य कहा जाएगा। भाजपा कोई बेहतर नही है। मोदी एक राजनीति क वंश के बारे में असभ्य भाषा इस्तेमाल करने के दोषी हैं। गुजरात के मंत्री ने वर्गीस कुरियन पर अमूल के फंड्स ईसाई मिशनरियों को देन का झूठा आरोप लगाया। मोदी ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दुग्धउत्पा दक देश बनाने वाले व्यक्ति पर लगाए आक्षेप की निंदा नहीं की। सारे दल खासतौर पर 'आप' और शिवसेना बार-बार विपक्षियों को बुरा-भला कहती हैं जैसे 'खिलजी की संतान'।

उदारवादी शिक्षा समुदाय में सम्मानजनक विमर्श व वार्तालाप की आदत निर्मित करने में फायदेमंद होती है। विरोधियों की जातीय पहचान पर अपमानजनक प्रहार पर उतारू होने की बजाय वह जायज जवाब खोजने के प्रति समर्पित होती है। यह राजनीति में धुर दक्षिण व धुर वाम विचारों की बजाय मध्यमार्ग की ओर ले जाती है? राजनीति क मध्यमार्ग सबको समायोजि त करता है, सामाजिक व सांस्कृति क विरोधाभासों को मिटाता है तथा औसत मतदाताओं, खासतौर पर अल्पसंख्यकों को आकर्षित करता है। इसलिए भारत में स्वतंत्रता के बाद ज्यादातर चुनाव मध्यमार्गी प्रत्याशियों ने ही जीते। यहां तक कि 2014 की मोदी लहर भी मोदी द्वारा विकास व जॉब का मध्यमार्गी वादा करने का नतीजा था, जिस ने महत्वाकांक्षी युवा मतदाताओं को आकर्षित किया। यह वादा पूरा नहीं हुआ, यह बिल्कुल अलग बात है और मोदी आज चिंतित नेता हैं।

आखिर में शिक्षा को उदारवादी ढंग से लेने से हम बेहतर मानव बनते हैं। यह हमें जॉब पाने और आजीविका कमाने की मांग से मुक्त करके अस्तित्वगत सवाल पर गौर करने की आज़ादी देती है कि हम कौन हैं और हम यहां क्यों हैं। इससे हमारा ध्यान खुद से हटकर दुनिया में हमारे स्थान पर आ जाता है। चरित्र बनाने के लिए 'खुद को भूल जाना' हमेशा अच्छा रहा है। जब इसे क्रिया और अनुभव से जोड़ा जाता है तो यह विवेक-बुद्धि (प्रोनेसिस) की ओर ले जाती है। जैसा अरस्तू ने कहा था- उचि त व्यक्ति के साथ उचि त समय पर, उचित तरीके से और उचि त कारण से उचित व्यवहार करना ही विवेक बुद्धि है। लेकिन, कैसे कोई गरीब या मध्यम वर्गीय भारतीय परिवार अपने बच्चों को जॉब के लिए तैयार न करने का जोखिम ले सकता है? निश्चित ही चार वर्षीय अंडर ग्रेजुएट अमेरिकन लिबरल एजुकेशन ऐसी लग्ज़री है, जो ज्यादातर भारतीयों के बस के बाहर की बात है। वास्तव में ऐसा संभव है यदि आप उदारवादी शिक्षा को सामग्री की बजाय सीखने की पद्धति मानें। इसकी शुरुआत प्राथमिक विद्यालय में होना चाहिए और पोस्ट ग्रेजुएशन तक चलनी चाहिए। उदारवादी शिक्षा कोई उद्देश्य नहीं बल्कि युवाओं को समाज के विचारपूर्ण सदस्य बनाने का जरिया है। यह आजीविका कमाने या अच्छे नागरिक बनने से अलग नहीं है। यह तो हमें सिर्फ यह याद दिलाती है कि जीवन में उपभोग व उत्पादन करने से भी बहुत कुछ है।

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