Dainik Jagran (Hindi) | 19 February 2015

जिस दिन आम आदमी पार्टी दिल्ली में चौंकाने वाली जीत दर्ज कर रही थी, उसी दिन मैं पाकिस्तानी लेखक शाहिद नदीम के लाजवाब नाटक दारा का आनंद उठा रहा था। इसका मंचन हाल ही में लंदन के नेशनल थियेटर में किया गया था। तमाम स्कूली छात्र औरंगजेब और दारा शिकोह के बीच चल रही खूनी जंग के बारे में जानते हैं, लेकिन यह नाटक केवल उत्ताराधिकार की लड़ाई तक ही सीमित नहीं है। इसमें दिखाया गया है कि भारत क्या था, क्या बन गया और क्या होना चाहिए था। यह आज की जनता को संबोधित था और इसमें नाखुश पाकिस्तान और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गंभीर नसीहत देता है। इसमें यह नसीहत भी है कि पिछले दिनों दिल्

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Dainik Bhaskar (Hindi) | 18 February 2015

पिछले छह हफ्तों से लेखक राजनेता शशि थरूर उस अजीब से चलन के शिकार हैं, जिसे मीडिया ट्रायल का नाम दिया जाता है। जब जिंदगी बुरा मोड़ लेती है तो मीडिया निष्ठुर भी हो सकता है। एक दिन तो यह सेलेब्रिटी को आसमान की बुलंदियों पर ले जाने में खुशी महसूस करता है और उतनी ही खुशी से यह अगले ही दिन उन्हें धड़ाम से नीचे लाकर पटक देता है। थरूर की पत्नी की त्रासदीपूर्ण मौत को एक साल से कुछ ज्यादा अरसा हो गया है। 1 जनवरी 2014 को सुनंदा ने अपने पति पर पाकिस्तानी पत्रकार के साथ अंतरंग संबंधों का आरोप लगाया था। जल्द ही दिल्ली के पांच सितारा होटल में उनकी मौत हो गई। कहा गया कि यह खुदकुशी थी। परंत

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Times of India | 15 February 2015

On the fateful day that the Aam Aadmi Party won a stunning victory in Delhi’s state election, I was captivated by the tragedy of ‘Dara’, a superb play by Pakistani writer Shaheed Nadeem, which opened recently at the National Theatre in London. Schoolchildren across India know all about the murderous rivalry between Aurangzeb and Dara Shikoh for the Mughal throne but this play is not only about a war of succession; it is about what India was, what it became, and what it might have been.

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Dainik Bhaskar (Hindi) | 03 February 2015

2014 का वर्ष भाजपा के लिए शानदार रहा!

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Times of India | 25 January 2015

For the past few weeks Shashi Tharoor, the celebrated writer and politician, has been the victim of a phenomenon called trial by media. The me dia can be unkind when life takes a bad turn. It delights in raising celebrities to the sky on one day, and with equal glee brings them crashing down the next. If you live your life under the glare of publicity, you must be pre pared to be tried by the public.

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Dainik Jagran (Hindi) | 29 December 2014

एक समय था जब मैं विश्वास करता था कि मैं एक वैश्विक नागरिक हूं और इस पर गर्व अनुभव करता था कि घास की एक पत्ताी बहुत कुछ दूसरी पत्ती की तरह ही होती है। लेकिन अब मैं पाता हूं कि इस धरती पर घास की प्रत्येक पत्ती का अपना एक विशिष्ट स्थान है, जहां से वह अपना जीवन और ताकत पाती है। ऐसे ही किसी भी व्यक्ति की जड़ उस जमीन में होती है जहां से वह अपने जीवन और उससे संबंधित धारणा-विश्वास को अर्जित करता है। जब कोई अपने अतीत की तलाश करता है तो उन जड़ों को मजबूत करने में मदद मिलती है और खुद में आत्मविश्वास आता है। इतिहास को भूलने का मतलब है खुद अपने आपको भुलाने का खतरा। अपनी इस धारणा के तहत

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Dainik Bhaskar (Hindi) | 16 December 2014

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही हमारे शहरों को पुनर्जीवित करने वाले महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की शुरुआत ‘स्मार्ट सिटी’ के बैनर तले करने वाले हैं। हालांकि, भारतीय शहर स्मार्ट तब बनेंगे जब इन्हें उन वास्तविक परिस्थितियों को केंद्र में रखकर बनाया जाएगा, जिनमें भारतीय काम करते हैं और उन्हें लालची राज्य सरकारों के चंगुल से छुड़ाकर स्वायत्तता दी  जाएगी। जब तक शहरों में सीधे चुने गए ऐसे मेयर नहीं होंगे, जिन्हें शहर के लिए पैसा जुटाने की आज़ादी हो और म्यूनिसिपल कमिश्नर जिनके मातहत हों, तब  तक शहरी भारत स्मार्ट होने वाला नहीं।

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Times of India | 14 December 2014

There was a time when I used to believe like Diogenes the Cynic that I was a citizen of the world, and I used to strut about feeling that one blade of grass is much like another.

Now I feel that each blade has its unique spot on the earth from where it draws its life and strength. So is a man rooted to a land from where he derives his life and his faith. Discovering one’s past helps to nourish those roots, instilling a quiet self-confidence as one travels through life. Losing that memory risks losing a sense of the self.

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Dainik Jagran (Hindi) | 22 November 2014

बहुत से भारतीयों की धारणा अभी भी यही है कि बाजार धनी लोगों को और अधिक धनी तथा गरीबों को और अधिक गरीब बनाता है तथा यह भ्रष्टाचार एवं क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा देता है। वास्तव में यह एक गलत धारणा है। वास्तविकता यही है कि पिछले दो दशकों में व्यापक तौर पर समृद्धि बढ़ी है और तकरीबन 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले हैं। बावजूद इसके लोग अभी भी बाजार पर अविश्वास करते हैं। आंशिक तौर पर इसके लिए आर्थिक सुधारकों को दोष दिया जा सकता है, जो प्रतिस्पर्धी बाजार की विशेषताओं अथवा धारणा को ब्रिटेन की मार्गरेट थैचर की तरह आम लोगों को नहीं बता सके। सौभाग्य से हमारे पास अब नरेंद्र मोद

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Times of India | 02 November 2014

Too many Indians still believe that the market makes “the rich richer and the poor poorer” and leads to corruption and crony capitalism. This is false, of course. Despite the market having generated broad-spread prosperity over two decades — lifting 250 million poor above the poverty line — people still distrust the market and the nation continues to reform by stealth. The blame lies partly with our reformers who have not ‘sold’ the competitive market as Margaret Thatcher did in Britain.

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