Dainik Jagran (Hindi) | 14 August 2015

स्वतंत्रता दिवस का अवसर थोड़ा रुकने, रोजमर्रा की घटनाओं पर सोच का दायरा बढ़ाने और पिछले 68 साल के दौरान अपने देश की यात्रा पर नजर डालने का बढिय़ा वक्त होता है। आजाद देश के रूप में अपने भ्रमपूर्ण इतिहास पर जब मैं नजर डालता हूं तो कुहासे में मील के तीन पत्थरों को किसी तरह देख पाता हूं। अगस्त 1947 में हमने अपनी राजनीतिक लड़ाई जीती। जुलाई 1991 में आर्थिक आजादी हासिल की और मई 2014 में हमने सम्मान हासिल किया। मैं आजादी के बाद के आदर्शवादी दिनों में पला-बढ़ा जब हम आधुनिक, न्यायसंगत भारत के जवाहरलाल नेहरू के सपने में यकीन करते थे। लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए, हमने पाया कि नेहरू क

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Times of India | 11 August 2015

An approaching Independence Day is a good time to pause, extend our circle of concern beyond day-to-day events, and reflect upon our nation`s journey over the past 68 years as a free nation. As i look back on our confused history as an independent nation, i discern in the fog three great milestones: in August 1947 we won our political freedom; in July 1991 we gained economic liberty; and in May 2014 we attained dignity.

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Times of India | 08 August 2015

The state has a duty to protect me from others but not from myself. This is the premise behind our Constitution, which reposes trust in me as a responsible citizen and gives me freedom to pursue my life in peace without interference from the state. Hence, the government was wrong in banning 857 pornography sites last weekend. To its credit, it realized its mistake by Tuesday and reversed its stand: it unbanned adult sites while rightly retaining the ban on child pornography.

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Dainik Bhaskar (Hindi) | 25 July 2015

हमारे गणतंत्र के साथ कुछ बहुत ही गलत हो गया है। हाल ही में शुरू हुए संसद के मानसून सत्र पर अपशकुन के बादल मंडरा रहे हैं। सांसदों को हमारी नाजुक अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के बारे में गहरी चिंता होनी चाहिए, हर महीने 10 लाख रोजगार कैसे लाएं यह सोचना चाहिए और वे हैं कि अगले घोटाले के बारे में सोच रहे हैं। जहां विपक्षी सांसदों का ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि संसद को कैसे ठप किया जाए, सत्ता पक्ष के सांसद घबराए खरगोशों की तरह भाग रहे हैं। दोनों भूल रहे हैं कि उन्हें क्यों निर्वाचित किया गया था।

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Times of India | 19 July 2015

Something has gone terribly wrong with our republic. There are ominous clouds over the approaching monsoon session of Parliament. When MPs should be deeply concerned with the fragile nature of our economic recovery, debating how to create a million jobs a month, they are straggling back to work in a stupor having forgotten why they were elected.

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Dainik Bhaskar (Hindi) | 16 June 2015

बांग्लादेश के साथ हुआ समझौता ऐतिहासिक है। इससे कश्मीर जितना ही पुराना विवाद तो हल हुआ ही, उपमहाद्वीप को साझा बाजार की ओर बढ़ने में भी मदद मिली है। व्यापार और निवेश पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अथक कूटनीति का ताजगीदायक फोकस है। सत्ता में आने के बाद से ही हमारे पड़ोसियों की जरूरतों पर उन्होंने बहुत निकटता से गौर किया है, जिसका फल अब सामने आ रहा है। हालांकि, समझौते पर बरसों से काम हो रहा था, लेकिन इतिहास इसका श्रेय मोदी को देगा। अन्य किसी भारतीय नेता की तुलना में उनमें यह सहज समझ है कि सत्ता धान के कटोरे से आती है न कि बंदूक की नली से, जैसा कि माओ का विश्वास था। इस संदर्भ म

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Times of India | 14 June 2015

Last week’s historic accord with Bangladesh erased a dispute as old as Kashmir while nudging the subcontinent towards a common market. Trade and investment have been the refreshing focus of Prime Minister Narendra Modi’s diplomacy. He understands instinctively that power emanates from a bowl of rice, not from the barrel of a gun. In this respect, he is following an ancient tradition that once made India a great trading nation that carried its amazing soft power on merchant ships.

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राजनीति थोड़े वक्त का खेल होता है, जबकि अर्थव्यवस्था लंबे समय का। दोनों आखिर में मिलते हैं, लेकिन बीच के समय में वे विपरीत दिशाओं में जाते लगते हैं। इस विरोधाभास के कारण ज्यादातर लोगों का निराश होना अपरिहार्य है। अपनी सरकार की पहली वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यही समस्या है। अच्छे रेकॉर्ड के बावजूद वे अपने समर्थकों की असाधारण रूप से ऊंची अपेक्षाओं को मैनेज करने में नाकाम रहे। मुख्य प्राथमिकताओं पर निगाह न रख पानेे से योजनाएं अमल में लाने की उनकी योग्यता संदेह के घेरे में आ गई। संघ परिवार लगातार सरकार के लिए शर्मनाक स्थिति पैदा करता रहा है। सबसे बड़ा आश्चर्य तो य

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