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क्या शिक्षा के लिए यह ऐतिहासिक पल है?

केंद्रीय विद्यालय संगठन ने अपने 240 स्कूलों से 12वीं की परीक्षा में बच्चों के असंतोषजनक प्रदर्शन पर स्पष्टीकरण मांगा है। प्रधानमंत्री कुछ समय से हमारे स्कूलों के नतीजों से चिंतित हैं और अपने एक भाषण में उन्होंने यहां तक कहा है कि हर कक्षा में यह प्रदर्शित होना चाहिए कि वहां बच्चे से क्या सीखने की अपेक्षा है, ताकि पालकों को मालूम हो कि बच्चे को मदद की कहां जरूरत है। यह शायद स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय से हटाने का निर्णायक कारण रहा हो। वे खासतौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा पूछे गए प्रश्नों के प्रति अनुत्तरदायी रही हैं और इसकी कीमत उन्होंने चुकाई है। भारती

आवास क्षेत्र से आएगी जॉब क्रांति

मेरे मित्र मुझे बताते हैं कि प्रसन्नता ‘भीतरी काम’ है और जीवन के प्रति मेरे रवैये से इसका संबंध है। वे मुझे जिंदगी की रफ्तार कम करने, योगा करने, ध्यान सीखने, खूब मुस्कराने और ईश्वर में भरोसा रखने को कहते हैं। ऐसी आध्यात्मिक बातचीत आमतौर पर मुझे गंभीर कर देती है। मैंने पाया है कि मेरी जिंदगी की खुशी दिन-प्रतिदिन की छोटी बातों में होती है- अपने काम में डूबे होना, किसी दोस्त के साथ ठहाके लगाना या अचानक सुंदरता से सामना हो जाना। खुशी तो यहीं, इसी क्षण है; किसी सुदूर अालौकिक जीवन में नहीं।

कन्हैया नहीं, जॉब की कमी खतरा

भारतीय राजनीतिक जीवन अजीब और विडंबनाअों से भरा है। छात्र नेता कन्हैया कुमार को राजद्रोह और राष्ट्र-विरोधी आचरण के आरोप में गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी ने उन्हें हीरो बना दिया। इसे असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता का प्रतीक माना गया। गृह मंत्री ने गिरफ्तारी का यह गलत तर्क देकर बचाव किया कि असाधारण लोकतांत्रिक देश अमेरिका भी राष्ट्र विरोध को सहन नहीं करता। गिरफ्तारी पर लगातार विरोध ने मीडिया का ध्यान सरकार के शानदार बजट से हटा लिया। एक अद्‌भुत भाषण में ‘स्वतंत्रता के प्रतीक’ ने अपना असली रंग दिखाया और एक ऐसी यथास्थितिवादी विचारधारा की तारीफ की, जिसमें आर्थ

अवसरों की चिंता करें असमानता की नहीं

फिर खबरों में है असमानता। फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी भारत में आए तो दुनिया में असमानता पर खूब बोले। उनका समाधान था अत्यधिक धनी लोगों पर टैक्स। फिर भारतीय कंपनियों में भुगतान में बढ़ते फर्क पर रिपोर्ट आई। सीईओ की बड़ी तनख्वाहों पर आक्रोश जताया गया। टीवी चैनल विजय माल्या की जीवनशैली पर टूट पड़े, जो खतरे में पड़े हमारे बैंकों के कर्जदार हैं।

अब नौकरियां पैदा करने पर ध्यान दें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह करो या मरो जैसा वर्ष है। यदि 2016 में आर्थिक वृद्धि महत्वपूर्ण तरीके से नहीं बढ़ती और थोक में नौकरियां पैदा नहीं होतीं, तो हम अच्छे दिन भूल ही जाएं यही बेहतर होगा। रोजगार पैदा करने और गरीब देश को धनी बनाने का आदर्श नुस्खा तो श्रम-बल वाले, निम्न टेक्नोलॉजी के थोक उत्पादन का निर्यात है। इसी ने पूर्वी एशिया, चीन और दक्षिण-पूर्वी एशिया को मध्यवर्गीय समाजों में बदला। पिछले 60 वर्षों में भारत मैन्यूफैक्चरिंग की बस में सवार होने से चूकता रहा है और आज वैश्विक प्रति व्यक्ति आय के छठे हिस्से से भी कम के साथ भारत सबसे गरीब बड़ी अर्थव्यवस्था है। उसका

हम भारतीय पाखंडी कैसे हो गए?

दूसरों से मुझे बचाना तो राज्य का कर्तव्य है, लेकिन मुझे खुद से ही बचाना इसके दायरे में नहीं आता। हमारे संविधान में यही धारणा निहित है, जो जिम्मेदार नागरिक के रूप में मुझ पर भरोसा करता है और राज्य से हस्तक्षेप के बिना मुझे अपनी जिंदगी शांतिपूर्वक जीने की आजादी देता है। इसीलिए पोर्न साइट ब्लॉक करने का सरकार का आदेश गलत था। उसे श्रेय देना होगा कि उसने जल्दी ही अपनी गलती पहचान ली और रुख बदल लिया- इसने वयस्कों की साइट से प्रतिबंध हटा लिया जबकि चाइल्ड पोर्न साइट पर पाबंदी जारी रखी, जो बिल्कुल उचित है। प्रतिबंध के बचाव में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भारतीय संस्कृति और परं

ये पांच चुनाव सुधार तत्काल हों

हमारे गणतंत्र के साथ कुछ बहुत ही गलत हो गया है। हाल ही में शुरू हुए संसद के मानसून सत्र पर अपशकुन के बादल मंडरा रहे हैं। सांसदों को हमारी नाजुक अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के बारे में गहरी चिंता होनी चाहिए, हर महीने 10 लाख रोजगार कैसे लाएं यह सोचना चाहिए और वे हैं कि अगले घोटाले के बारे में सोच रहे हैं। जहां विपक्षी सांसदों का ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि संसद को कैसे ठप किया जाए, सत्ता पक्ष के सांसद घबराए खरगोशों की तरह भाग रहे हैं। दोनों भूल रहे हैं कि उन्हें क्यों निर्वाचित किया गया था।

व्यापारिक भूतकाल, मौजूदा कूटनीति

बांग्लादेश के साथ हुआ समझौता ऐतिहासिक है। इससे कश्मीर जितना ही पुराना विवाद तो हल हुआ ही, उपमहाद्वीप को साझा बाजार की ओर बढ़ने में भी मदद मिली है। व्यापार और निवेश पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अथक कूटनीति का ताजगीदायक फोकस है। सत्ता में आने के बाद से ही हमारे पड़ोसियों की जरूरतों पर उन्होंने बहुत निकटता से गौर किया है, जिसका फल अब सामने आ रहा है। हालांकि, समझौते पर बरसों से काम हो रहा था, लेकिन इतिहास इसका श्रेय मोदी को देगा। अन्य किसी भारतीय नेता की तुलना में उनमें यह सहज समझ है कि सत्ता धान के कटोरे से आती है न कि बंदूक की नली से, जैसा कि माओ का विश्वास था। इस संदर्भ म

साहसी फैसले न होने से निराशा

राजनीति थोड़े वक्त का खेल होता है, जबकि अर्थव्यवस्था लंबे समय का। दोनों आखिर में मिलते हैं, लेकिन बीच के समय में वे विपरीत दिशाओं में जाते लगते हैं। इस विरोधाभास के कारण ज्यादातर लोगों का निराश होना अपरिहार्य है। अपनी सरकार की पहली वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यही समस्या है। अच्छे रेकॉर्ड के बावजूद वे अपने समर्थकों की असाधारण रूप से ऊंची अपेक्षाओं को मैनेज करने में नाकाम रहे। मुख्य प्राथमिकताओं पर निगाह न रख पानेे से योजनाएं अमल में लाने की उनकी योग्यता संदेह के घेरे में आ गई। संघ परिवार लगातार सरकार के लिए शर्मनाक स्थिति पैदा करता रहा है। सबसे बड़ा आश्चर्य तो य

एक त्रासदी का मानवीय पहलू

पिछले छह हफ्तों से लेखक राजनेता शशि थरूर उस अजीब से चलन के शिकार हैं, जिसे मीडिया ट्रायल का नाम दिया जाता है। जब जिंदगी बुरा मोड़ लेती है तो मीडिया निष्ठुर भी हो सकता है। एक दिन तो यह सेलेब्रिटी को आसमान की बुलंदियों पर ले जाने में खुशी महसूस करता है और उतनी ही खुशी से यह अगले ही दिन उन्हें धड़ाम से नीचे लाकर पटक देता है। थरूर की पत्नी की त्रासदीपूर्ण मौत को एक साल से कुछ ज्यादा अरसा हो गया है। 1 जनवरी 2014 को सुनंदा ने अपने पति पर पाकिस्तानी पत्रकार के साथ अंतरंग संबंधों का आरोप लगाया था। जल्द ही दिल्ली के पांच सितारा होटल में उनकी मौत हो गई। कहा गया कि यह खुदकुशी थी। परंत