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सुशासन से भारत में घुलेंगे-मिलेंगे कश्मीरी

हमारा सामना इस असुविधाजनक सत्य से है कि हिंदुत्व व कश्मीरियत सहित हर राष्ट्रवाद काल्पनिक ह

कश्मीर के राजनीतिक दर्जेमें किए बदलाव से कश्मीरियों में गुस्सा, भय, अलगाव और आत्म-सम्मान खोने की भावना है। कई लोगों ने कश्मीरियत को पहुंची चोट को कानूनी और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की है लेकिन, जरूरत राष्ट्रीय पहचान की दार्शनिक समझ की है। खासतौर पर कश्मीरियों और भारतीयों को इस तथ्य को समझना होगा कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पहचानें काल्पनिक हैं। हिंदुत्व और कश्मीरियत दोनों आविष्कृत अवधारणाएं हैं। इससे कुछ रोष शांत करने में मदद मिलेगी।

गरीबी हटाओ की नहीं, अमीरी लाओ की जरूरत

कुछ दिनों पहले रविवार की रात एक टीवी शो में एंकर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 5 लाख करोड़ डॉलर के जीडीपी के लक्ष्य का तिरस्कारपूर्व बार-बार उल्लेख किया। यह शो हमारे शहरों के दयनीय पर्यावरण पर था और एंकर का आशय आर्थिक प्रगति को बुरा बताने का नहीं था, लेकिन ऐसा ही सुनाई दे रहा था। जब इस ओर एंकर का ध्यान आकर्षित किया गया तो बचाव में उन्होंने कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि तो होनी चाहिए पर पर्यावरण की जिम्मेदारी के साथ। इससे कोई असहमत नहीं हो सकता पर दर्शकों में आर्थिक वृद्धि के फायदों को लेकर अनिश्चतता पैदा हो गई होगी।

हमें चाहिए असरदार राज और ताकतवर समाज

नरेन्द्र मोदी के फिर चुने जाने के बाद धीरे-धीरेबढ़ती तानाशाही का भय फिर जताया जारहा है लेकिन, मुझे उलटी ही चिंता है। मुझे शक्तिशालीसे नहीं बल्कि कमजोर व बेअसर राज्य-व्यवस्था(राज) से डर लगता है। कमजोर राज्य-व्यवस्था मेंकमजोर संस्थान होते हैं, खासतौर पर कानून का कमजोरराज होता है, जिसे न्याय देने में दर्जनों साल लग जातेहैं और अदालतों में 3.3 करोड़ प्रकरण निलंबित रहतेहैं। यह कमजोरों को शक्तिशाली के खिलाफ संरक्षणनहीं देती और विधायिका के हर तीन में से एक सदस्यके आपराधिक रिकॉर्ड को बर्दाश्त कर लेती है। कमजोरराज्य-व्यवस्था लोगों के मन में निश्चिंतता के बजायअनिश्चितता पैदा करती है औ

उदारवादी शिक्षा से ही मजबूत होगा लोकतंत्र

सबको समायोजित करने और सामाजिक व सांस्कृतिक विरोधाभास मिटाने वाले मध्यमार्ग का निर्माण

चुनावों की एक और शृंखला आकर चली गई, अब आम चुनाव की आहट है। किसी सर्जरी की तरह चुनाव नेताओं के दिमाग से सारे विचार निकालकर उनका फोकस आर्थिक व शासन संबंधी सुधारों के कठि न काम को भुलाकर लोकलुभावन कदमों व खैरात बांटने पर केंद्रित कर देते हैं। नतीजों ने दिखाया कि भारतीय स्वभाव से शक्की हैं और अपने नेताओं को बदलने में झिझकते नहीं। 2014 की विशाल निश्चितताओं की जगह अब 2019 के महान संदेह ने ले ली है।

उन लोगों को सम्मा न दीजि ए जो हमसे अलग हैं

अपनी खुली और उल्ला सपूर्ण भारतीय परम्पराओं से सीखकर पुरानी रूढ़ियों से मुक्त होना होगा

लगातार ऊंची वृद्धि दर से ही आएंगे अच्छे दिन

पश्चिम की तर्ज पर हमारे यहां वृद्धि दर पर संदेह जताना ठीक नहीं, इससे हमें बहुत फायदे भी मिले हैं

Take advantage of Walmart to free the farmer

वॉलमार्ट द्वारा फ्लिपकार्ट के अधिग्रहण के शोर में दुनिया की सबसे बड़े वाणिज्यि क सौदे का महत्व लगभग हर किसी से छूट गया। सुर्खियां तो एमेजॉन और वॉलमारट के बीच होने वाले संघर्ष बयां कर रही थीं। न्यूज़ चैनल बेंगलुरू के दो युवाओं की सिड्रैला कथा कहने लगे कि कैसे उन्होंने 140 हजार करोड़ रुपए की कंपनी निर्मित की और कई कर्मचारियों को करोड़पति बना दिया। अर्थशास्त्रियों ने इसमें भारत का युग आते देखा कि चीन की तरह भारत भी अब सबसे शक्ति शाली वैश्विक सप्लाई चेन में शामिल हो जाएगा। निर्यात को बल मिलेगा, नया विदेशी निवेश व रोजगार बढ़ेगा। सौदे पर मिलने वाले कैपिटल गेन्स टैक्स को लेकर विभागों की लार टपक रही होग

स्कूलों को लाइसेंस राज से मुक्त करना होगा

स्कूलों को लाइसेंस राज से मुक्त करना होगा

स्कूल खोलने के लिए अब भी 30 से 45 अनुमतियों की जरूरत होती है, स्वायत्तता से ही आएगी गुणवत्ता

गुस्से के युग में अपनी जीवनशैली को श्रेष्ठ न मानें

संदर्भ... देश के हर वर्ग में बढ़ता रोष व असंतोष और रोजगार बढ़ाने पर पूरा ध्या न केंद्रित करने की जरूरत